भारत काहर क्षेत्र में विकास : अमेरिका जैसी विविधता नीति ( Affirmative Action Plan) सेही होगा
सन् 1960 के दशक में विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली देश संयुक्त अमेरिका नस्लीय दंगों की चपेट में आया था। तब शिक्षा, आय, धन, स्वास्थ्य और न्याय की जबरदस्त असमानता के कारण अमेरिका के गोरे प्रभु वर्ग और अश्वेतों के मध्य दंगों का सिलसिला शुरू हो गया था। यूँ तो इस असमानता का शिकार कई समूह थे, किन्तु सर्वाधिक शिकार अफ्रीकी अमेरिकन ( काले) थे। वे दास प्रथा के अमानवीय व्यवहार से निकलने के 100 साल बाद भी बहुत से नागरिक अधिकारों और अवसरों से बंचित थे। किन्तु बंचना और शोषण जब हद से ज्यादा होने लगा तब काले उग्र हो गये और उन्होंनें दंगों का सिलसिला शुरू कर दिया। इसी क्रम में अक्रोशित काले युवाओं ने अक्टुबर 1966 में, " ब्लैक पैंथर " जैसा एक बेहद उग्र संगठन खडा़ किया, जिसने दुनियां भर के बंचित युवाओं को उद्वेलित किया था। इसी से प्रेरित होकर भारत में " दलित पैंथर " जैसा अक्रामक संगठन खडा किया गया था। दंगों के सैलाब और ब्लैक पैंथर जैसे संगठन की स्थापना ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन वी जांनसन को चिंतित कर दिया था। उन्होंने इस स्थिति से पार पाने के लिए 27 जुलाई,1967 को " कर्नर आयोग " गठित किया, जिसने 2 मार्च, 1968 में अपनी रिपोर्ट सौप दी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, ' हमारा राष्ट्र दो समाजों में उभर रहा है: एक श्वेत दूसरा बंचित अश्वेत! दोनों एक दूसरे से अलग हैं, एक दूसरे से असमान! इस दूरी को पाटे विना शांति बहाल नहीं हो सकती और बिना शांति के अमेरिका समृद्धिशाली राष्ट्र नहीं बन सकता ' इस दूरी को पाटने के लिए आयोग ने सिफारिश किया, ' अमेरिकी संपदा, संस्थाओं, ज्ञान के क्षेत्र इत्यादि में काले एवं अन्य बंचित नस्लीय समूहों की भागीदार बनाया जाय ' आयोग की सिफारिशों का सम्मान करते हुए राष्ट्रपति जांनसन ने आव्हान किया, ' अमेरिका हर जगह दिखे अर्थात अमेरिका की पूजी, सरकारी और गैर-सरकारी नौकरियों, उघोग-व्यापार, शिक्षण संस्थाओं, फिल्म, मिडिया इत्यादि में प्रत्येक नस्लीय समूह का प्रतिनिधित्व दिखे। इसके लिए उन्होंने भारत की आरक्षण प्रणाली की आइडिया को उधार लेकर उसे नौकरियों से आगे बढाकर उघोग-व्यापार, फिल्म, मिडिया इत्यादि प्रत्येक क्षेत्र तक: प्रत्येक नस्लीय समूहों की भागीदारी लागू कर दिया।
उनकी उस विविधता नीति का उनके बाद के तमाम राष्ट्रपतियों : निक्सन, कार्टर, रोनाल्ड रीगन इत्यादि ने भी अनुसरण किया। इसके तहत वहाँ अल्पसंख्यक रूप से गण्य 1.50 % आवादी बाले रेड इंडियन्स, 11.5 % वाले हिस्पानिकस, 13% वाले अफ्रीकन मूल के काले और 3.5% वाले एशियन पैसेफिक मूल के लोगों को उनके संख्यानुपात में आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षिक, फिल्म, मीडिया इत्यादि तमाम क्षेत्र की गतिविधियों में वाजिब प्रतिनिधित्व अर्थात आरक्षण मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ। अमेरिका शक्ति के समस्त स्त्रोतों में विविधता के प्रतिबिम्बन के प्रति इतना आग्रही है कि वह हर संस्थान को अपनी बार्षिक डाइवर्सिटी रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिए बाध्य करता है। रिपोर्ट में यदि यह पता चलता है कि किसी संस्थान ने डाइवर्सिटी लागू नहीं करने अर्थात विभिन्न नस्लीय समूहों को संख्यानुपात में अवसर देने में कोताही वरती है। तब उस पर इतना भारी आर्थिक-दंड लगा दिया जाता है, जिसे झेलना कठिन होता है। इस दंड के भय से सभी संस्थाएं डाइवर्सिटी लागू करती है।
इसी डाइवर्सिटी पालिसी के सहारे अमेरिका आर्थिक और सामाजिक विषमता के साथ आंतरिक कलह से पार पाया, जो इसके सबसे अधिक शक्तिशाली राष्ट्र में विकसित होने का सबव बना। इसी डाइवर्सिटी पालिसी अर्थात " जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी हिस्सेदारी " वाली नीति के गर्भ से जन्में अफ्रीकी मूल के कालों में से रास्पबेरी जैसे ढेरों पत्रकार, ओप्राबिन्फ्रे और एडी मर्फी जैसे ढेरों चर्चित टीवी एंकर, रांबर्ट एल जांनसन जैनिकस ब्रायंट जैसे कई बिलियनेयर उघमी, बिल स्मिथ, औ डेंजिल वाशिंगटन, हैलेबेरी, हूं पीएम गोल्डबर्ग इत्यादि जैसे असंख्य आंस्कर विजेता फिल्म सितारें, निर्माता, निर्देशक; बराक ओबामा, कमला हैरिस जैसे अनेकों राजनेता बने, इत्यादि।
इसी विविधता नीति से कल्पना चावला, इंदिरा नुई, सुन्दर पिचाई जैसे अनगिनत भारतीय अमेरिका में अपनी प्रतिभा का झंडा गाड़ने में सफल हुए। इसी विविधता नीति से अमेरिका को दुनिया के बेहतरीन प्रतिभाओं को अपने राष्ट्री-हित में उपयोग करने का अवसर सुलभ कराया, जिसके फलस्वरूप आज अमेरिका विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र बना है।
भारत में यह नीति के विपरीत, ब्राह्मणवाद की बजह से SC, ST, OBC के आरक्षण का कोटा 20% से कम, स्वतंत्रता के 75 सालों बाद भी भरा गया है। यदि आरक्षण सही तरह से लागू किया गया होता तो भारत के बहुजनों का इतना बुरा हाल कभी नहीं होता। बहुजन समाज से ईर्ष्या इतनी अधिक कि देश की स्वच्छता में निम्न वर्ग के चौथी श्रेणी की सभी नौकरीयां अस्थायी कर उनका निजीकरण अटल जी की सरकार ने कर दिया था। पक्की झाड़ू लगाने की नौकरी कर, निम्न वर्ग के लोग अपने बच्चों को पढा लेते थे, अच्छे पदों पर नौकरी पा जाते थे, पर ब्राह्मणवादीयों को यह भी अच्छा नहीं लगा, इसलिए शिक्षा का निजीकरण कर दिया तथा क्लास फोर्थ की सभी पोस्ट भाजपा सरकार ने अस्थायी कर निजी हाथों में दे दिया। भाजपा सरकार ने 2014 - 2026 तक करीब 100000 सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया है तथा निरंतर बजट कम कर रही है। जबकि शिक्षा से ही गरीबी और अज्ञानता दूर की जा सकती है।
जनवरी 2018 में आई आंक्सफैम की रिपोर्ट में यह बताया गया कि भारत के 1% सबसे अधिक अमीर लोगों की दौलत सन् 2016 में 58% से उछल कर एक बर्ष में 73% तक पहुँच गयी थी। सन् 2023 में यह रिपोर्ट ने बताया कि " Extreme wealth and extreme poverty have increased simultaneously in India for first times in last 25 years." भारत की एकता - अखंडता और विशेषाधिकारयुक्त वर्गों के लिए निश्चय ही यह खतरे की घंटी है। इसके भयावह परिणामों की ओर संकेत करते हुए आंक्सफैम इंडिया की सीईओ निशा अग्रवाल ने लिखा है कि ' अरबपतियों की बढती संख्या देश की अच्छी अर्थव्यवस्था का संकेत नही है खराब होती अर्थव्यवस्था का संकेत है। देश के 70 करोड़ (50% ) से अधिक लोग कठिन परिश्रम करके देश के लिए भोजन उगा रहे है, इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रहे है, उन्हें अपनें बच्चों की फीस भरने, दवाई खरीदने और दो वक्त का खाना जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। अमीर-गरीब के बीच बढती खाई लोकतंत्र को खोखला कर रही है और भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा दे रही है ! ' बहरहाल यह रिपोर्ट ने भारत की डिमोक्रेसी के लिए तो खतरे की घंटी बजा ही दी है, इससे भी बढकर यह सामाजिक अन्याय मुक्त भारत के निर्माण की राह में उभरी एवरेस्ट सरीखी बाधा से भी अवगत करा दिया है। कैसे!, इसे समझने के लिए सामाजिक अन्याय की अवधारणा से अवगत होना जरूरी है।
क्या है सामाजिक अन्याय? :
सामाजिक विज्ञानियों के अध्ययनों के आधार पर कहा जाता कि नस्ल, लिंग, जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रादि के आधार पर विभाजित समाज के विभिन्न समाजिक समूहों में से कुछ एक का शासकों द्वारा शक्ति के स्त्रोतों (आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक, धार्मिक इत्यादि) से जबरन वहिष्कार ही समाजिक अन्याय कहलाता है। इस लिहाज से दुनियां में स्त्री के रूप में विघमान आधी आबादी सर्वत्र ही सामाजिक अन्याय का शिकार रही है। सर्वाधिक अन्याय के शिकार समुदायों में अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत तथा भारत के बहुजन रहे है। इनमें भारत के बहुजनों को ही शीर्ष पर रखा जा सकता है। क्योंकि दलित, आदिवासी और पिछड़ों से युक्त भारत का बहुजन समाज विश्व के उन गिने-चुने समाजों में एक है जिन्हें जन्मगत कारणों से उपरोक्त शक्ति के समस्त स्त्रोतों से हजारों बर्षों तक बहिष्कृत रखा गया है। ऐसा उन्हें सुपरिकल्पित रुप से धर्म के आवरण में लिपटी उस वर्ण-व्यवस्था के प्रावधानों के तहत किया गया जो विशुद्ध रुपसे शक्ति के सभी स्त्रोतों से जबरन बहिष्कार की व्यवस्था रही है। इसमें अध्ययन-अध्यापन, पौरोहित्य, भूस्वामित्व, राज्य संचालन, सैन्य वृति, उघोगधंधे, व्यापार, आदि सहित गगन स्पर्शी सामाजिक मर्यादा सिर्फ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सर्वर्णों के मध्य वितरित की गयी है। स्वा-धर्म पालन के नाम पर कर्म-शुद्धता की कलंकित अनिवार्यता के फलस्वरूप वर्ण-व्यवस्था ने एक आरक्षण व्यवस्था का रुप ले लिया जिसे हिन्दू आरक्षण व्यवस्था कहा जाता है।
हिन्दू - आरक्षण से बने दो वर्ग: विशेषाधिकारयुक्त सुविधा भोगी सर्वण और शक्तिहीन बहुजन वर्ग। हिन्दू आरक्षण ने चिरस्थायी तौर पर यह बिभाजन आज भी कायम है। इस हिन्दू आरक्षण में शक्ति के सारे स्त्रोत सिर्फ और सिर्फ विशेषाधिकारयुक्त तबको के लिए हजारों साल आरक्षित रहे। इस कारण जहाँ विशेषाधिकारयुक्त वर्ग चिरकाल के लिए सशक्त तो दलित, आदिवासी और पिछडे चिरकाल के लिए आसक्ति और गुलाम बनने के लिए अभिशप्त हुए। लेकिन दुनिया के दूसरे गुलामों की तुलना में भारत के बहुजनों की स्थिति सबसे बदतर इसलिए हुई क्योंकि उन्हें आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों के साथ ही शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों तक से भी बहिष्कृत रखा गया। इतिहास गवाह है कि मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी समुदाय के लिए शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियां धार्मिक देशों द्वारा निषिद्ध नहीं की गयी, जैसा कि हिन्दू आरक्षण-व्यवस्था के तहत बहुजनों के साथ किया गया।
यही नहीं इसमें उन्हें अच्छा नाम तक भी नहीं रखने का अधिकार नहीं था। इनमें सबसे बदतर स्थिति दलितों की रही " वे गुलामों के गुलाम रहे " ,इन्ही गुलामों को गुलामी से निजात दिलाने की चुनौती इतिहास ने डा. अंबेडकर के कंधों पर सौपी, जिसका उन्होंने नायकोचित अंदाज में निर्वाहन किया।
अगर जहर की काट जहर से हो सकती है तो हिन्दू आरक्षण की काट अंबेडकरी आरक्षण से हो सकती थी जो हुई भी कुछ हद तक। इसी अंबेडकरी आरक्षण से सही मायने में सामाजिक अन्याय के खात्मे की प्रक्रिया शुरू हुई। आरक्षण- व्यवस्था के चलते जिन सब पेशों को अपनाना अस्पृश्य, आदिवासीयों के लिए दु्साहसपूर्ण सपना था, वे अब खूब दुर्लभ नहीं रहें। इससे धीरे- धीरे उनके राष्ट्र की मुख्यधारा से जुडने और सरलीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। संविधान में डा. अंबेडकर ने अस्पृश्य- आदिवासियों के लिए आरक्षण सुलभ कराने के साथ धारा 340 का जो प्रावधान किया, उससे परवर्तीकाल में मंडलवादी आरक्षण की शुरुआत हुई थी, जिससे पिछडी जातियों का भी सामाजिक अन्याय से निजात पाने का मार्ग प्रशस्त हुआ था। स्वाधीनोत्तर भारत में सामाजिक अन्याय दूरीकरण के लिहाज से यह भारतीय राज्य द्वारा उठाया गया बलिष्ठतम कदम था, पर यही बहुजनों के लिए काल बन गया। मंडलवादी आरक्षण लागू होते ही हिन्दू आरक्षण का सुविधा भोगी तबका एक बार फिर शत्रुतापूर्ण मनोभाव लिए बहुजनों के खिलाफ मुस्तैद हो गया। मंडलवादी आरक्षण के बिरोध के घोडों पर सवार होकर ही भाजपा के लालकृष्ण अडवानी ने रथ यात्रा निकाली, खूनखराबे हुए और भाजपा एकाधिक बार सत्ता में आई और फिर झूठ के सहारे सत्ता में आई और देखते ही देखते अप्रतिरोध्य बन गयी। और भाजपा ने अपने गुजराती मित्रों को औने -पौने दामों पर गलत तरीके से सरकारी और अर्ध-सरकारी 23 मुख्य संस्थान बेच दिऐ, जिनसे बहुजनों को रोजगार मिलता था।
मंडल बारोधी नीतियों के भयावह परिणाम:
मंडल की रिपोर्ट लागू होने के वाद हिन्दू आरक्षणवादियों द्वारा बहुजनों को नये सिरे से गुलाम बनाने के लिए निजीकरण, उदारीकरण, विनिवेशीकरण, ठेकाकरण इत्यादि उपक्रम धडल्ले के साथ चलाए गए तथा तरह तरह की साजिशें की गई। जिसके फलस्वरूप आज भारत का बहुजन समाज एक ऐसे बदहाल व बंचित समुदाय में तब्दील दिनों दिन होते जा रहा है, जिसकी मिशाल वर्तमान विश्व में मिलना दुर्लभ है। मंडलोत्तर काल में जिस तीव्र विकास को देखते हुए देश के हुकमरान और कुछ नासमझ अर्थशास्त्री भारत को विश्व महाशक्ति बनने के दावे कर रहे है, जिस विकास में बहुजनों की भागीदारी नहीं के बराबर हो रही है। जिसे देखते हुए पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह को एकाधिकवार अर्थशास्त्रीयों से रचनात्मक सोच की अपील करनी पडी थी। अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन ने तो बर्षों पहले साफ साफ कह दिया था कि हम उन से सहमत नहीं है जो कहतें है कि तेज विकास से गरीबी में कमी आई है।
मंडल के बाद बहुजनों को गुलाम बनाने के लिए जो साजिशें हुई, उनका भयावह परिणाम सन् 2015 में वैशि्वक धन बटवारे पर आई, ' क्रेडिट सुइसे ' की रिपोर्ट ने खुलासा किया कि भारत की टाप धनी 10% आवादी के पास 81%धन है! जबकि नीचे की 50% आवादी (70 करोड़ जनता) सिर्फ 4.1%धन पर आधे पेट भूखे रह कर गुजर बसर करने के लिए विवश है। क्रेडिट सुइसे की ही हकीकत को सिद्ध करने के लिए मार्च 2017 में प्रकाशित मानव विकास सूचकांक की रिपोर्ट में बताया गया था कि मानव विकास के मामले में विश्व के 187 देशों में से 131 वें स्थान पर रहने वाला भारत, अरबपतियों की संख्या के हिसाब से संसार में चौथे स्थान पर आ गया। रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 के दौरान भारत में सर्वाधिक धनी 1% आबादी के पास 37% संपत्ति हुआ करती थी जो 2005 में बढ़कर 42%, 2010 में 48%, 2012 में 52% तथा 2016 में 58.5% तक पहुँच गयी। 24 जुलाई, 1991 से शूरू हुई भूमंडलीकरण की अर्थव्यवस्था के बाद देश में अरबपतियों, मध्य वर्ग की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई, उसमें बहुजनों की संख्या नगण्य ही रही, यह किसी भी अध्ययन से पता चल जाएगा।
सामाजिक, आर्थिक अन्याय मुक्त देशों का आदर्श माडल, " अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका का विविधतापूर्ण (Affirmative Actions plan): "
आज की तारीख में आर्थिक, सामाजिक अन्याय के शिकार बनाये गये विश्व के बाकी समुदायों के जीवन में चमत्कारिक बदलाव आ चुका है। अमेरिका के जो अश्वेत दास- प्रथा से मुक्त होने के 100 साल बाद भी दलितों से कहीं ज्यादा बदहाली में थे सन् 1970 के दशक में वहां अंबेडकरी आरक्षण से उधार ली हुई सर्वव्यापी आरक्षण बाली डाइवर्सिटी पालिसी ने उनके जीवन में आश्चर्यजनक बदलाव ला दिया है। आज अमेरिका में सर्वत्र उनकी हिस्सेदारी दिख रही है। वे फिल्म और टीवी के सितारे है, बड़े-बडे उघोगपतियों में सुमार है, वे बडी - बड़ी कंपनियों के सीइओ है। नासा से लेकर हार्वर्ड और वालमार्ट से हालीवुड, जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ उनकी प्रभावी उपस्थित न दिख रही हो, इसी बीच उनके मध्य का ही एक व्यक्ति ओबामाजी अमेरिका का प्रैसिडेंट तक बन चुके है।
जहाँ तक दक्षिण अफ्रीका के गोरों द्वारा शासित मंडेला के लोगों का सबाल है सन् 1994 में रंग-भेदी सत्ता के अवसान के बाद के दो दशकों में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका प्रभुत्व स्थापित हो गया है। कभी 9-10% गोरों का वहाँ शक्ति के स्त्रोतों पर 80-90% कब्जा हुआ करता था, आज वे तमाम क्षेत्रों में आपने संख्या अनुपात पर उपरोक्त आदर्श माडल की बजह से सिमटते जा रहे है तथा इससे दुखी होकर वहाँ से पलायन करते जा रहे है।
लेकिन भारत के बहुजनों की स्थिति अमेरिका और द. अफ्रीका के कालों के मुकाबले आत्यंत कारुणिक है, उनमें नाम मात्र का बदलाव आया है। आज भी हजारों साल पूर्व की भांति उघोग-व्यापार पर 80-90% कब्जा वर्ण-व्यवस्था के विशेषाधिकारयुक्त तबकों का ही है। पूरे देश में आज जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हुए हैं, उनमें 80-90 % फ्लैटस उन्हीं के है। पांश कालोनीयों में आज भी किसी दलित-आदिवासी-पिछडे को रहते देखना अचम्भे जैसा लगता हैं। मैट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे- छोटे कस्बों तक में छोटी- छोटी दुकानें से लेकर बडे-बडे शापिंग माल्स में 80-90 % से ज्यादा दुकानें इन्हीं सर्वणों की हैं। चार लेन से लेकर आठ- आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाडियों के सैलाब जो नजर आते हैं उनमें प्रायः 90% से ज्यादा गाडियां उन्हीं की ही होती है। देश में जनमत निर्माण में लगे छोटे -बडे अखबारों से लेकर तमाम चैनल उन्हीं के है। फिल्म और मनोरंजन उद्योग पर 90% से अधिक कब्जा उन्हीं का ही है। संसद-विधान सभाओं में बहुजन के जन प्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक ठाक हो, पर मंत्रिमंडलों में दबदबा उन्हीं का है। मंत्रिमंडलों के लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने बाले प्रायः 90% अधिकारी सर्वण वर्ग से ही होते ही है। शासन-प्रशान, उघोग-व्यापार, फिल्म- मिडिया इत्यादि में जन्म जात सुविधा भोगी वर्गों का बेहिसाब वर्चस्व आंखों में अगुली डालकर बताता है कि भारत में हजारों बर्ष पूर्व की भांति सामाजिक और आर्थिक अन्याय की धारा आज भी जोर-शोर से प्रवाहमान है।
सामाजिक अन्याय मुक्त भारत निर्माण के लिए देश के हुक्मरान करे, " अमेरिकी और दक्षिण अफ्रीकी माडल (Affirmative Action Plan) का अनुसरण:
ऐसे में आँक्फैम की ताजी रिपोर्ट देश की एकता-अखंडता और विशेषाधिकारयुक्त वर्गों के लिए निश्चय ही खतरे की घंटी है, इसका संकेत 2015 में ही क्रेडिट सुइसे की रिपोर्ट आने के बाद बहुत से अखबारों द्वारा की गयी इस टिप्पणी, ' गैर-बराबरी अक्सर समाज में उथल-पुथल की बजह बनती है।' सरकार और सियासी पार्टीयों को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए। संसाधनों और धन का न्याय पूर्ण बटवारा कैसे हो, यह सबाल अब प्राथमिक महत्व का हो गया है। इस संभावित उथल-पुथल से बचने का एक ही उपाय है, " समाजिक और आर्थिक अन्याय मुक्त भारत का निर्माण!"
यदि देश के हुक्मरान सामाजिक अन्यायमुक्त भारत के निर्माण के प्रति गम्भीर है तो जिस तरह अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के कभी के नर-पशु ( Human cattle) रहे अश्वेत की सामाजिक अन्याय के दलदल से निकालने के लिए उन्हें हर प्रकार की नौकरियों, उघोग-व्यापार, शैक्षिक-सांस्कृतिक, फिल्म- मिडिया और भूमि में शेयर सुनिश्चित किया वैसे ही उपक्रम वे भारत में चलायें। कैसे हो, यह सबाल अब प्राथमिक महत्व का हो गया है। इस संभावित उथल-पुथल से बचने का एक ही उपाय है, " सामाजिक और आर्थिक अन्याय मुक्त भारत का निर्माण " यदि देश के हुक्मरान सामाजिक अन्याय भुक्त भारत के निर्माण के प्रति गंभीर है तो जिस तरह अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के नर-पशु ( Human cattle) रहे अश्वेत की सामाजिक अन्याय के दलदल से निकालने के लिए उन्हें हर प्रकार की नौकरियों, उघोग-व्यापार, शैक्षिक- सांस्कृतिक, फिल्म- मिडिया और भूमि में न्यायोचित संख्या के अनुरूप शेयर सुनिश्चित किया, वैसा ही उपक्रम भारत में चलायें। पर इनकी विचारधारा में खोट ही खोट (असमानता) है। इसलिए बहुजनों को इस विषय पर युद्ध स्तर पर जाग्रति करना ही होगा, बहुजनों की सरकार बनानी ही होगी तभी उपरोक्त बहुजन व मानव हितैषी व शक्तिशाली देश बनाने का सपना पूरा होगा।
डा. जीडी दिवाकर, अध्यक्ष
संत गाडगे मिशन, दिल्ली।
M. No. - 9868356884